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अपने अपने दाँव 

नाटक अपने-अपने दावा लाइन होते पारिवारिक सामाजिक त्रासदी का चित्रण करता है इस नाटक में तमाम संवेदनाओं को लाभ कर रिश्तों पर हावी होता हुआ स्वार्थ और भौतिकवाद किस प्रकार मानवीय विसंगति को प्रकट करता है यह देखने योग्य है या हास्य प्रश्न किसी विशेष कथा पत्र भाषा या अपंगता को हास्य का विषय ना बनाकर केवल स्थिति जन्म स्थितियों को ही व्यंग्य का विषय बनता है यह मतविपूर्ण है स्वयं लेखक की दृष्टि है कि या नाटक एक सिचुएशनल कॉमेडी है बहुत से हास्य नाटकों में पत्र हकलाते हैं लंगड़ाते हैं बिना बात कंधे उठाते हैं आदि आदि और इस प्रकार हास्य उत्पन्न किया जाता है इस नाटक के किसी भी पत्र में कोई भी शरीर का दोष नहीं है और ना ही संवादों में हस उत्पन्न करने के लिए जुमलेबाजी का सहारा लिया गया है चरित्र और संवाद स्वाभाविक और सहज हैं लेकिन नाटक की विकास गति और कथानक के क्रमिक उद्भाषण में ऐसी स्थितियां आती हैं जिसमें पात्रों के सहज होने पर भी दर्शक अपनी हंसी नहीं रोक पाए

FACTS:

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